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Thursday, December 24, 2015

क्रिसमस

कालेज के तमाम बढ़िया बातन में एगो बात इहो रहे कि कॉलेज में हर तरह के त्यौहार मनावल जा | कब्बो केहू इ न सोचे कि इ हमार त्यौहार ह कि केहू अउरी के बस मनवले के उत्साह रहे | आज जमाना बदल गईल बा जेसे कि कुछ लोग हमार-उनकर कुछ ढेर सोचे लगल बाने पर आजुओ बहुत से लोग अइसन बाने जवन कब्बो ना सोचेलें | ओ समय हर त्यौहार बस आपन होखल करे | ओह साल से पहिले हमके कब्बो भी क्रिसमस मनवले के अनुभव नाइ भईल रहे | कुछ पता ना रहे कि का होला क्रिसमस और कइसे मनावल जाला ? इहाँ तक कि कब्बो केहू के भुलाइयो के क्रिसमस के बधाई ना देहलीं | ओहू के कारन रहे, कब्बो केहू क्रिसमस वाला दोस्त ना बनल ऊपर से शिशु मंदिर में पढ़नी त उहाँ कब्बो मनावल भी ना गईल त स्कूलवो में ना सीख पवलीं |

सेमेस्टर पेपर के चक्कर में ओ बार नया साल पर केहू घरे ना जा पावल | वैसे में त कॉलेज में क्रिस्चियन लड़का-लड़की ना के बराबर रहले लेकिन हमारे ही क्लास में एगो क्रिस्चियन लड़की मारिया रहे | मारिया से हमार बस ओतने बातचीत होखे कि एक बार उ हमसे पेन मांग लेहले रहे बस | ठीक से 'hi' 'hello' भी ना होखे | जइसे आज कल फेसबुक पर 'like' के संबंध होला बस ओइसही हमार और मारिया के संबंध रहे | दिसंबर के महिना रहे, शाम के समय रहे, जगह रहे कॉलेज के कैंटीन अउर तारीख रहे 25 यानी क्रिसमस के दिन |

ठण्ड में ठिठुरत हम जात रहलीं कैंटीन से बाहर तब्बे अचानक से मारिया सामने पड गईली | अब सामने पड़िए गईली त हमहू फाटक से बोल दिहलिं "HAPPY CHRISTMAS" | इ सुनते ही उ हँसे लगली और कहली "HAPPY CHRISTMAS"  नाही बुद्धू  "MERRY CHRISTMAS" बोलल जाला, ल इ केक खा हम खुद बनवलें हईं | अगर कवनो लइका केहू के बुद्धू आ चाहे एसे मिलत जुलत कुछ बोल देई त बुरा लागी लेकिन हमके उ बुद्धू बहुत ही प्यारा लागल और केक त बहुते मस्त रहे | मारिया फिर पूछली
"तू लोग ना मनावे ल का क्रिसमस?"
"नाही पते नइखे कैसे मनावल जाला"
"बहुत आसान बा, दोस्तन के साथे खुशियाँ बांटS और सांता से जवन विश
मांगे के बा मांग लS"
"सांता सबकर विश पूरा करेलें का?" तनी सोच के हम पूछलीं | एहपर उ बोलली
"विश पूरा होखले के केके पडल बा? जिंदगी में विश होखे के चाहीं , पूरा
होखल जरुरी नइखे , बुझलS"

अब्बे हमहन के बात चलते रहे कि कैंटीन के गेट से हमार दोस्त सब चिल्ला-चिल्ला के बोलावे लगने और ओन्नी मारिया के भी कॉलेज के कुछ अउर लोग आ के  "MERRY CHRISTMAS" विश करे लगने | हम बेमन से अपने दोस्तन के पास चल गईलीं त ईगो दोस्त कोहनी मार के ओई दिन मारिया से बात कईले के पार्टी मांग लेहलस | हमहू ख़ुशी-ख़ुशी मारिया से बातचीत के "ख़ुशी " दोस्तन में पार्टी देके बांट दिहलीं | उ हमार पहिला "MERRY CHRISTMAS" रहे |

आज एतना साल के बाद जब क्रिसमस के शाम में बइठ के लिखत हईं त मारिया अउर उनके साथे भईल अधूरा बातचीत याद आवत ह | ओ अधूरा बातचीत पूरा कईले के विश हम हर क्रिसमस के मांगेलीं, कहे से कि मारिया कहले रहलीं कि "जिंदगी में विश होखे के चाहीं , पूरा होखल जरुरी नइखे" |

Thursday, October 23, 2014

पर्व मेला - गोवर्धन पूजा (चौथा दिन)

       भारतीय पर्वन में मानव के प्रकृति के साथ सीधा संबंध दिखाई देला, अउर एह बात के सबसे बधन सबूत ह गोवर्धन पूजा या गोधन | कातिक महीना के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा के दिन गोधन मनावल जाला | एह दिन बलि पूजा, अन्न कूट, मार्गपाली भी मनावल जाला | अन्नकूट या गोधन में गाय, बैल आदि पशुअन के नहवा के फूल माला, धुप, चन्दन आदी से उनकर पूजा कईल जाला | गोबर से गोवर्धन पर्वत बना के जल, मौली, रोली, चावल, दही, फूल, और तेल के दिया जला के पूजा और परिक्रमा कइल जाला | शास्त्रों में कहल गइल बा की गाय वैसे ही पवित्र होले जैसे की नदीयों में गंगा, साथ ही साथ गाय के देवी लक्ष्मी के स्वरुप भी कहल गइल बा | जवने तरे देवी लक्ष्मी अपने भक्तन के सुख-समृद्धि डेली वैसे ही गाय ओने दूध से इंसान के स्वास्थ्य रुपी धन प्रदान करेली | एही से गाय के प्रति श्रद्धा प्रकट करे के खातिर ही कार्तिक शुक्ल के प्रतिपदा के दिन गोवर्धन या गोधन पूजा कइल जाला | ऐसे जुडल एगो पौराणिक कहानी भी हवे |

        कहानी इ हवे की एक बार देवराज इन्द्र के अभिमान हो गइल | इन्द्र के अभिमान तूरे खातिर भगवान श्री कृष्ण जी एगो लीला रचनी | एक दिन जब पूरा ब्रज मंडल कवनो पूजा के तयारी करत रहे त, इ देख के बल गोपाल जी अपने मैया यशोदा से पुछली की इ का होता ? मैया यशोदा उहा के बतावली की, लल्ला हमहन के देवराज इन्द्र के पूजा खातिर अन्नकूट उत्सव के तैयारी करत बानी के | इ सुन के भगवान कृष्ण जी बोललीं की मैया हमहन के इन्द्र के पूजा कहे करेनी के ? तब मैया यशोदा कहली की इन्द्र वर्षा के देवता हवे और उ वर्षा करेनS जेसे की अन्न के पैदा होला और उनसे हमहन के गैयन के चारा भी मिलेला | तब कृष्ण जी बोलली की तब त हमहन के गोवर्धन पर्वत के पूजा करे के चाही कहे से की हमहन के गई कुल त उहे चरेली सब, एही से त गोवर्धन पूजनीय हवे और इन्द्र त कब्बो दर्शन भी नाही देले और पूजा न कइले से नाराज भी होले | अतः अइसन अहंकारी के पूजा कइले के का फायदा और करे के भी नाही चाही |

       लीलाधरी कृष्ण के माया से और लीला से सब इन्द्र के बदले गोवर्धन पूजा कइले | इ देख के इन्द्र क्रोधित हो के अपने अपमान के बदला लेवे खातिर घनघोर वर्षा शुरू कर दिहले | तब मुरलीधर कृष्ण सबके बचावे के खातिर अपने कानी उंगली पर पूरा के पूरा गोवर्धन पर्वत ही उठा लेहनी और सब व्रजवासियन के अपने अपने गायन के साथे अपने सरन में ले लिहनी | इ देख के इन्द्र और क्रोधित होके और घनघोर बारिश करे लगनS | तब भगवान कृष्ण सुदर्शन चक्र के गोवर्धन के ऊपर लगा के वर्षा के पानी के नियंत्रित कइनी और शेषनाग के मेड बना के पानी के पर्वत के ओर आवे से रोक दिहली |

       लगातार सात दिन के वर्षा के बाद इन्द्र के अहसास भइल की कृष्ण कवनो साधारण आदमी न हवे | तब उ ब्रह्मा जी के पास गइने, ब्रह्मा जी उनके पूरा सच्चाई बतवली की कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार और पूर्व के पुरषोत्तम नारायण हवे | तब इन्द्र के अभिमान टूट गइल तब उ कृष्ण के शरण में जाके माफ़ी मंगले और उनकर पूजा कर के भोग भी लगवले |

       ए पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा शुरू भइल | व्रजवासी एही दिने गोवर्धन के पूजा करेले, और गाय, बैल के नहवाके उनके रंग लगा के सजावल जाला और उनके गटइ में नया रसरी दलाल जाला | गाय और बैल के गुड चावल खिया के उनकर सम्मान और पूजा कइल जाला | त हवे न गोधन प्रकृति से जुडल पर्व |

Wednesday, October 22, 2014

पर्व मेला - दीपावली (तीसरा दिन)

त्योहर और उत्सव हमहन के जीवन के सुख और हर्षोल्लास के प्रतीक होला जवन की समय के अनुसार अपने रूप-रंग और आकार में अलग-अलग होला | त्यौहार मनावे के विधि-विधान भी अलग हो सकेला पर एकर अंतिम अभिप्राय कवनो विशेष आस्था के संरक्षण या फिर आनंद के प्राप्ति होला | सब त्योहरन से कवनो न कवनो पौराणिक कहानी जरुर जुडल होला, अउर ए सब कहानी कुल के संबंध तर्क से न होकर अधिकतर आस्था से होला | इहो कहल जा सकेला की पौराणिक कहानी प्रतीकात्मक होलापर उनकर मकसद आम इंसान के इ बतावल होला की हमेशा बुराई पर अच्छाई के विजय होला | और साथ ही साथ में आम इंसान के पाप और अधर्म से बचावल भी होला |


दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें


कातिक महीना के अमावस्या के दिन दिवाली के त्यौहार मनावल जाला | 'दिवाली' के 'दीपावली' भी कहल जाला | मूल रूप से दिवाली अकेला त्यौहार न होके पांच पर्व के एगो श्रृंखला हवे | लगातार पांच दिन, दिवाली से दो दिन पहले से लेके दिवाली के दो दिन बाद तक के पांच दिन | धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा और यम द्वितीया या भैया दूज | ए सब पर्व से जुडल अलग-अलग कहानी भी बा |

पांच पर्व के श्रृंखला में दिवाली मुख्य दिन हवे, जेके रोशनी के पर्व के रूप में कातिक महीना के अमावस्या के मनावल जाला | दीपावली दो शब्द से मिल कर बनेला 'दीप' और 'अवली', जेमे की 'दीप' के अर्थ हवे 'दिया' और 'अवली ' के मतलब होला 'पंक्ति', मतलब 'दीपावलीके मतलब भइल 'दिया के पंक्ति' | दीपावली के ही बिगडल रूप दिवाली हवे |

अपने देश के हिंदू लोगन के सबसे बडहन त्यौहार हवे दिवाली, जेसे जुडल अनेक पौराणिक कहानी कहल जाला | जेमे की सबसे प्रचलित कहानी के अनुसार देश के उत्तरी भाग में दिवाली के पर्व भगवान श्री रामचंद्र के द्वारा राक्षसराज रावण के वध कइले के बाद वापस अयोध्या लौटले के खुशी में मनावल जाला | महर्षि वाल्मीकि के द्वारा लिखल ग्रन्थ रामायण के अनुसार अयोध्या के राजकुमार राम अपने विमाता कैकेयी के इच्छा और पिता दशरथ के आज्ञानुसार १४ साल के वनवास काट के और लंकानरेश रावण के वध कर के एही दिने अपने पत्नी सीता, छोटहन भाई लक्ष्मन और भक्त हनुमान जी के साथे अयोध्या लौटल रहन, और उनके स्वागत में पूरा नगर के दिया जला के सजावल गइल रहे | ओही समय से दिया जलाके, पटाखा  फोड़ के और मिठाई बाँट के ए शुभ दिन मनावे के परंपरा शुरू भइल |

एगो अन्य मान्यता के अनुसार दिवाली के दिने ही माता लक्ष्मी जी दूध के सागर से, जेके की 'केसर-सागर' अथवा 'क्षीर-सागर' भी कहल जाला से उत्पन्न भइल रहनी | उत्पत्ति के बाद माता लक्ष्मी जी सारा संसार के प्राणीयन के सुख-समृधि के वरदान दिहली, एही से दिवाली पर माता लक्ष्मी जी के पूजा कइल जाला | अउर इहो मान्यता ह की पूरा श्रध्दा से पूजा कइले से माता लक्ष्मी जी अपने भक्तन पर खुश होके उनके धन-सम्पदा और वैभव से भर देनी |


एकरे अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रन में दिवाली के दिने के फसल के कटाई के पर्व के रूप में भी मनावल जाला | एह समय तक फसल के कटाई के बाद किसान के हाँथ में धन आ चुकल होला, एही से उ, ओ धन के माता लक्ष्मी जी के चरण में अर्पित कर के त्यौहार के खुशी भी मनावल जाला | दिवाली के अवसर पर माता लक्ष्मी जी अपने वाहन उल्लू पर सवार होके निकलेली और रौशनी से डूबल घरन में प्रवेश करेली |

Monday, October 20, 2014

पर्व मेला - धनतेरस (पहिला दिन)

दिवाली के शुरुआत होला कार्तिक महीना के कृष्ण पक्ष के त्रयोदशी के दिन से | ऐ दिन के धनतेरश भी कहल जाला | इ दिने आरोग्य के देवता धनवंतरी के आराधना होला और नया- नया बर्तन, आभूषण आदी चीज खरीदले के भी रिवाज़ हवे | आज के दिन घी के दिया जला के माता लक्ष्मी के बुलावल जाला |

धनतेरश यानि की धन त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी के भी पूजा कइल जाला | भगवान धनवंतरी देवताओ के डाक्टर यानी की वैद्य भी मानल जालें | इनकर पूजा कइले से आरोग्य-सुख यानी की स्वस्थ्य लाभ मिलेला | शास्त्रों में लिखल कहानी के अनुसार आज के ही दिने समुन्द्र मंथन से भगवान धनवंतरी अपने हाथे में अमृत के कलसा ले के प्रकट भइल रहने | धनवंतरी के भगवान विष्णु के अंशावतार भी मानल जाला | कहल जाला की संसार के चिकित्सा विज्ञान बतावे के खातिर भगवान विष्णु धनवंतरी के अवतार लिहनी |


धनतेरस के हार्दिक शुभकामना


एगो दूसर कहानी भी प्रचलित हवे एह दिन के बारे में | कहल जाला की एक बार भगवान विष्णु मृत्युलोक में घुम्मे खातिर आवत रहनी त माता लक्ष्मी जी भी उहा से साथे चले के आग्रह कइनी तब विष्णु जी कहनी की ठीक बा, लेकिन जइसन हम कहब वइसन ही करे के पड़ी | लक्ष्मी जी उहा के बात मान गइनी और भगवान विष्णु जी के साथे मृत्युलोक पर घुम्मे खातिर अइनी | कुछ देर के बाद एगो जगह पर पहुच के विष्णु जी कहनी की जब तक हम न आई तब तक आप यही रुकी | हम दक्षिण दिशा के ओर जात बानी, लेकिन आप उधर मत आइब |

लक्ष्मी जी के चंचला अइसे ही ना कहल जाला उ चंचल-मन हईं | त चंचल-मन कहा माने वाला रहे लगनी सोचे की आखिर ओ दिशा में अइसन का बा की हमके मन कर दिहनी ह और खुदे गइनी ह | लक्ष्मी जी भी लगनी पीछे-पीछे जाये, कुछे दूर गइले पर एगो सरसों के खेत मिलल जेम्मे की फूल लागल रहे | सरसों के फूलाइल खेत के शोभा और महक से बहक के लगनी फूल तूर-तूर के आपन श्रृंगार करे | फिर आगे बढ़नी त गन्ना के खेत मिलल इहा भी गन्ना तूर के रस चुभे लगनी | ओही समय भगवान विष्णु जी आ गइनी और लक्ष्मी जी के उहा देख के गुस्सा हो गइनी और शाप देहली की जवनव किसान के आप चोरी कइले बानी ओकर १२ साल ले सेवा करीं | इहा देखे वाला बात बा की चोरी एगो अइसन अपराध ह की ओकर सजा भगवान के भी मिलल |

त शाप देके त भगवान विष्णु जी आपन लोक चल गइनी पर अब लक्ष्मी जी के ओ किसान के घरे रहे के पडल | अब अगर साक्षात लक्ष्मी जी जहा रहब उहा त धन धान्य और खुशहाली अइबे करी | इहे भइल किसान के घरे भी ओ किसान के घर खुशहाली से भर गइल और धन सम्पदा के कवनो ओर-छोर ना रहल | किसान के १२ साल बड़ा आनंद से कटल लेकिन जब १२ साल के बाद भगवान विष्णु जी माता लक्ष्मी जी के वापस लेवे खातिर अइनी त किसान उहाँ के वापस भेजे से मना कर दिहलस | तब माता लक्ष्मी जी कहली की अगर हमके रोकल चाहत बानी त जइसन हम कहत बानी वइसन करीं | कल तेरस के दिने तू आपन घर लीप पोत के साफ़ करअ | रात में घी के दिया जला के रखिह शाम के हमार पूजन करिह और एगो तम्बा के कलश में पैसा रख के रख दिह हम ओही में रहब लेकिन दिखाई ना देब | एह एक दिन के पूजा कइले से हम साल भर तोहरे घरे से नाही जाइब | एतना कही के उ चली गइनी | अगला दिने किसान लक्ष्मी जी के कहले अनुसार पूजन कइलसऔर ओकर घर हमेशा खातिर धन धान्य से भर गइल | एही से हर साल तेरस के दिने लक्ष्मी जी के पूजा कइल जाला |

Tuesday, October 14, 2014

समझौता – शारदा नन्द प्रसाद

अदमी के तूर देवे वाला अन्हार भीतर-बाहर सगरो छावल रहे | अइसन उजुग हो गइल कि केतनो किचकिचा के आँख मुनले पर नीन के नाव ना |

अकेल परले पर आदमी के बुझाला कि हर जड़ बस्तु चेतन हो गइल बा | खेत के झूर भूत आ रसता के रसरी साँपे नियर लागेला | आस्ते-आस्ते जब इतमिनान होला त बुझाला कि हमहू जियतानी | जिनगी भर के छितराइल बात के आदमी ठीकरा अइसन बटोर लेला अ कवनो बेवस्था के जिनगी जियला के अहसान ओकरा होखे लागेला |

हाथ में लाल लाल चूरी, नाक में झुंझी देह पर सुगवा रंग के सारी अउर मन में ओह दिन के बात जवन डोली में चढ़े के बेर सुसुकत सुनाइल रहे “गोइयाँ हमार तोहार नन्हे के पिरितिया, पिरितिया जनि छोडीह हो गोइयाँ” रील नियर उभरल जात रहे |

इ बात माटी के तेल नियर गाँव भर में पसर गइल कि उ ससुरा से भाग आइल | ओकरा माई के बूझे में इचिको देर ना लागल | ससुरा वाला जियत माटी पोंछे के तैयार ना रहलेसन |

“ अपना करेज खातिर नु सगरी अघावत करे के परता | एगो समय रहे जे एगो छन बिसारस ना , अब कुकुरो बरोबर नइखन गुदानत | मन त अइसन अंउतीयाइले बा कि कवनो एनर पोखर ध लीं “

सउसे दिन चढ गइल | अभी ले उठे के बेरा ना भइल | कवनो काम ना धन्धा | चार घरी दिन ले पटाइल रहतारे | चौबीसों घंटा आँख पर मलेछ घेरले रहता | सांचो कहल जाला “ ना छुतिहर फुटेला ना भूतहर मुएला ” |

कुछ बुदबुदइले आ खांसते उठके बइठ गइले | पुछलन “ भागेलुआ कहवा बा ? इहो ससुरा ढढू के पड़ा हो गइल, बाकिर एकरा तनिको होश हवास ना भइल | पत्ते ना चले, कहाँ रहेला, का करेला ? जब देख, त जुआ, जब देख त जुआ, जानू ओही से धरम करम चली | दुनो महतारी बेटा एक टेम बात ले नइखन सन करत | ना जाने, कहाँ कागज भुलाइल बा ? माया जवान ना करावे | बाकिर सोचिले कि हमर के बा | मार दि चाहे गरिया के दी, इहे नु पुछबो करी | अभिन लरिकवन उमरियो न बा, केतना दिन के भइबे कइल............”