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Wednesday, March 4, 2015

होली – एगो रंग-बिरंगा त्यौहार

होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं
गिले शिकवे भूल कर दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं

शोले फिल्म के इ गाना यथार्थ के धरातल पर लिखल कवि के कल्पना ही ना हवे बल्कि भारतीय समाज के होली के बारे में व्यक्त कईल गईल सोच भी ह | होली के रंग-बिरंगा त्यौहार के मस्ती में डूब के जब दुश्मन भी रंग लगावे खातिर आवे ला त ओके इंसान कईसे मना कर सकेला | फागुन (फाल्गुन) महिना के पूर्णिमा के मनावल जाये वाला इ त्यौहार, ना बस बच्चों अउर युवाओं खातिर ह बल्कि बुढा- बुजुर्ग खातिर भी ह |


होली


जइसन की हम अपने हर त्यौहार के ऊपर लिखल पोस्ट में कहत आईल बानी की हर भारतीय त्यौहार के साथे कवनो ना कवनो पौराणिक कहानी जुडल होला और साथ ही में ओकर वैज्ञानिक महत्व भी होला | अइसही होली से भी जुडल एगो कहानी ह जवन की बहुत ही लोकप्रिय ह | कहानी कुछ ए तरह हवे कि भगत प्रह्लाद के पिता हिरन्यकश्यप खुद के ही भगवान कहत रहने, उ भगवान् विष्णु के घोर बिरोधी रहने जबकि प्रह्लाद कट्टर विष्णु भक्त | बार-बार मना कईले के बाद भी जब प्रहलाद ना मनने त उनके मारे के कई बार कोशिश कईल गईल लेकिन एक्को कोशिश सफल ना भईल | अंत में हार के हिरन्यकश्यप अपने बहिन होलिका से मदद मंगने, होलिका के पास एगो कपडा रहे जवन की आग में ना जले | होलिका पाहिले त अपने भाई के समझवाली लेकिन बाद में उनकरे जिद के आगे झुक के मदद करे खातिर तैयार हो गईल, लेकिन उ अपने भतीजा प्रह्लाद से भी बहुत प्यार करत रहली | प्रह्लाद के अपने गोंद में लेके होलिका चिता पर बइठ गईली, लेकिन जब आग के लपट चारो तरफ से घिर गईल त होलिका आपन कपडा जवन कि आग में ना जले ओके प्रह्लाद के ओढा देहली ओह कपडा के कारन प्रह्लाद त बच गयिने लेकिन होलिका जल के भस्म हो गईली |

होलिका दहन के दिन आज भी बुकुआ (उबटन) लगावल जाला जेसे की पूरा शरीर के गन्दगी साफ़ हो जाला इ गन्दगी इन्सान में व्याप्त पाप और मनोविकार के दर्शावेला अउर ओके होली के दिने सुबेरे में लेजाके होलिका के अर्पण कईल जाला | बुकुआ सरसों के भून के पिसल एगो प्राकृतिक लेप अउर दावा ह जवन की थकान भी मिटा देला और साथ ही में शरीर पर तेल के परत फइला देला जेसे की होली के बाद रंग उतरले में आसानी होला |

अब होली के वैज्ञानिक पक्ष के भी बात कर लिहल जां | दिवाली के करीब चार महिना के बाद घर के सफाई भी जरुरी हो जाला कहें से की ठण्ड में आम जनता के सफाई के हिम्मत ना होला | त ठण्ड के बाद घर के सफाई कईले के कारन बीमारी के कवनो कारन ना बचेला | अगर ध्यान देहल जां त होली के त्यौहार साल के ओह समय होला जब मौसम आपन मिजाज बदलत रहेला, ठण्ड के अंतिम समय चलत रहेला और साथ में गर्मी के शुरुआत होत रहेला | एह समय मौसम के बदलले के कारन अगर ध्यान न दिहल जा त इन्सान बीमार पड सकेला | त होली के दिन लगभग दिन भर पानी अउर रंग में भींग के अपने शरीर के मौसम के अनुकूल भी बनावल जाला | साथ ही साथ ठण्ड के कारन लोग एक दुसरे के घरे न जा पवेलें त होली के दिने सबसे मिल के रिश्तन में पडल ठण्ड के फिर से गरम कईल जाला |

होलिका दहन के अगिला दिने होली के त्यौहार मनावल जाला जेम्मे की लोग एक दुसरे पर अबीर, गुलाल और रंग डालेलें | होली ना सिर्फ मित्र, रिश्तेदार और शुभचिंतक के साथ ही खेलल जाला बल्कि एह दिने त दुश्मन भी सब बैर भुला के गले लग जाने अउर होली खेलेलें | पिचकारी अउर गुब्बारा में रंग भर के एक दुसरे के ऊपर फेकले से बच्चन के फुर्सत न मिलेला | बच्चा सब त कई दिन पहिले से ही पिचकारी और रंग लेके सबके परेशान करें लें | मिठाई, गुझिया अउर मालपुआ त हर घर में ही बनेला | “बुरा ना मानो होली है के नारे के साथ जब हुरियारन के झुण्ड के झुण्ड निकलेला त गली मोहल्ला के शोभा देखे वाला होला |

त गुझिया-मालपुआ खाई सभे अउर बुरा ना मानो होली है के नारा लगायीं लेकिन ध्यान रखीं कि आपके मजा केहू खातिर सजा ना बन जा |


आप अउर आपके परिवार के हमारे अउर हमरे परिवार के तरफ से होली के ढेर सारा शुभकामना |

Saturday, February 28, 2015

होली के दम तोडत परम्परा

अगर इ कहल जा की आज होली आपन रूप बदलत बा त कवनों अतिश्योक्ति ना होई | सामुदायिक पहचान रख्खे वाला इ त्यौहार आज धीरे-धीरे जाती अउर समूह के बीच में बंटत जात बा भारत में होली के स्वरूप बदल रहल बा, एकर पुरान परम्परा सब ख़तम होता |


फगुआ गावत लोग


पहिले भोजपुरी समाज में फागुन के महिना चढ़ते ही वातावरण में होली के रंगीला और सुरीला तान सुनाई देवे लागे, भोजपुरी में एके फाग या फगुआ कहल जात रहे | बकायदा महीना भर पहिले से ही एकर महफ़िल जमत रहे | दिन भर खेत में काम कर के थकल गाँव के लोग जब शाम के ढोल और मजीरा लेके फगुआ के राग छेड़ें त सब थकान उतर जा, बस गाँवे में ही काहें शहरो में भी इहे हाल रहे | अब समय के कमी, बदलत जीवन शैली अउर कई अन्य वजह से शहर के कहे गाँव में भी इ परम्परा ना दिखाई देला | होली के मउका पर शहर में महामूर्ख सम्मेलन के आयोजन होखे अउर अखबार में नामी-गिरामी लोगन के अजीब-अजीब उपाधि दिहल जा जवने के मतलब बस लोगन के हंसावल रहे | कई नामी लोग त अपने उपाधि से खुश होके उपाधि देवे वाला के इनाम भी दें | लेकिन समय के साथ अब इहो परम्परा दम तोडत बा |

पलाश, सरसों के फूल अउर पछुआ हवा (पश्चिम दिशा से चले वाला हवा) के अलसायिल ठंडक से फागुन के पता माघ में ही चलत रहे | कुछ साल पहिले तक त माघ महिना से शुरू होखे वाला फागुन आज आपन अंदाज बदल लेहले बा | गाँव में माघ में ही मिले वाला फागुन के आहट आज के एह व्यस्त दौर में बिला गईल बा, अब त फागुन में भी उ महफ़िल ना सजत ह जवन की पहिले माघ में ही सजल शुरू हो जा | फागुन में ही शहर से लेके गाँव तक में सुनाई देवे वाला ढोलक के थाप अउर फाग के राग के सुने खातिर आज कान तरस जाला |

पहिले होली के दिने नौजवानन के घुम्मे वाला टोली अउर घरे-घरे जा के फगुआ गावे के परम्परा अब त दिखाई भी न देत ह | फगुआ गवले के बाद मिले वाला रंग, अबीर अउर खाए खातिर मालपुआ अब के नौजवान कहाँ पइहें | एह सब परम्परा के दम तोडले के कारन आज कुछ लोग आपस में बढ़त दुश्मनी, भेदभाव और वैमनस्य के मानत हवें त कुछ लोग पश्चिमी परम्परा के हावी होखल मानत हवें |

सिवान (बिहार) जिला के फगुआ गायक श्री रामेश्वर प्रसाद एगो अखबार में कहले रहने की प्रेम अउर सौहार्द के इ त्यौहार में लोग दुश्मन के भी गले लग जात रहने, पहिले एक महिना तक चले वाला होली प्यार के त्यौहार रहे | गाँव भर के लोग एक जगह इकठ्ठा होके होली के हुडदंग में मस्त हो जात रहने | गाँव में एक महिना तक ढोल अउर मंजीरा बाजत रहे | फगुआ के गीतन में पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, देवर-भाभी के रिश्तन में हास्य दिहल जा त धार्मिक गीत के भी शामिल कईल जात रहे | लेकिन अब गायन की इ परंपरा खतम होत जा रहल बा | अब इनकरे जगह फूहड़ गीत बजे लागल बा | लेकिन अब एक दुसरे से ताल मेल के आभाव, क़द्रदानन के कमी अउर तेज होत पलायन के चलते इ पूरान परम्परा अब दम तोडत बा | युवा पीढ़ी के त अब फगुआ के बोल भी नइखे याद |” अब हम दुसरे के का कहीं फगुआ के बोल त हमहू के नइखे याद |

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के श्री सुभाष चन्द्र सिंह जी कहत हवें "अब लोगन में प्रेम के भावना ही नइखे | लोग टीवी से चिपकल रहत हवे | पहिले गाँव में चौपाल से होली खेले खातिर निकले वाले टोली में बुढा-बुजुर्ग से लेके गाँव के युवा तक रहे | इ टोली सामाजिक एकता के मिशाल रहत रहे | केतना हंसी मजाक होखे गाँव के भाभी से लेके भाभी के बहिन तक से,जीजा से लेके साली तक से, लेकिन ओम्मे एगो सम्मान और लिहाज भी रहे | का मजाल रहे कि केहू अनाप-शनाप कहे | लेकिन आज त सब ख़तम होत जात बा | होली के दिन भंग अउर ठंडई बडहन-बडहन बर्तन में घोलल जा अउर जात-पांत से ऊपर उठ के हर आदमी ओकर सेवन करे | अब त जात-पांत के भावना सतह पर आ गईल बा अउर भंग और ठंढई के जगह अंग्रेजी शराब ले लेहले बा |”