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Tuesday, January 6, 2015

पिया मोर बसै गउरगढ़ मैं बसौं प्राग हों - धरनीदास

पिया मोर बसै गउरगढ़ मैं बसौं प्राग हों
सहजहिं लागू सनेह, उपजु अनुराग हो।
असन बसन तन भूषन भवन न भावै हो।
पल-पल समुझि सुरति मन, गहवरि आवै हों

पथिक न मिलहि सजन जन, जिनहिं जनावों हो।
विहवल विकल विलखि चित, चहुँदिसि धावों हों
होई अस मोहिं लेजाय कि, ताहि ले आवै हो।
तेकरि होइबों लउँडिया, जे रहिया बतावै हो।

तबहिं त्रिया पत जाय, दोसर जब चाहै हो।
एक पुरूष समरथ धन, बहुत न चाहै हो।
धरनी गति नहिं आनि, करहु जस जानहु हो।
मिलहु प्रगट पट खोलि, भरम जनि मानहु हो।

Monday, December 8, 2014

दउरत-दउरत जिनिगी भार हो गइल - विजेन्द्र अनिल

दउरत-दउरत जिनिगी भार हो गइल,
भोरहीं में देखिलऽ अन्हार हो गइल।

केकरा के मीत कहीं, केकरा के दुश्मन,
बदरी में सभे अनचिन्हार हो गइल।

पुरवा के झोंका में गदराइल महुआ,
अचके में पछुआ बयार हो गइल।

दरिया में कागज के नाव चलि रहल,
गड़ही के पानी मँझधार हो गइल।

रेत के महल इहास बन्हले बा,
तुमड़ी के भाग, ऊ सितार हो गइल।

कतना उठान भइल दुनिया के,
प्रेम आउर कविता जेवनार हो गइल।

Thursday, November 6, 2014

गाँव क बरखा - चंद्रशेखर मिश्र

बरखा

हमरे गाँव क बरखा लागै बड़ी सुहावन रे।।
सावन-भादौ दूनौ भैया राम-लखन की नाईं,
पतवन पर जेठरु फुलवन पर लहुरु कै परछाईं।
बनै बयार कदाँर कान्ह पर बाहर के खड़खड़िया,
बिजुरी सीता दुलही, बदरी गावै गावन रे।।

बड़ी लजाधुर बिरई अंगुरी छुवले सकुचि उठेली,
ओहू लकोअॅरी कोहड़ा क बतिया, देखतै मुरझेली।
बहल बयरिया उड़ै चुनरिया फलकै लागै गगरिया,
नियरे रहै पनिघरा, लगै रोज नहावन रे।।

मकई जब रेसमी केस में मोती लर लटकावै,
तब सुगना रसिया धीर से घुँघट आय हटावै।
फूट जरतुहा बड़ा तिरेसिहा लखैत बिहरै छतिया,
प्रेमी बड़ी मोरिनियाँ लागै मोर नचावन रे।।

Tuesday, October 28, 2014

किरिनियाँ कहाँ चलि जाले? - अनिरुद्ध तिवारी 'संयोग'

सारी सोनहुली सबेर झमका के,
सँवकेरे रूप के अँजोर छिटिका के,
जाये का बेर ढेर का अगुताले-
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

चलत-चलत बीच रहिया में हारल,
दुपहरिया तेज तिजहरिया के मारल,
धनि बँसवरिया का पाछे लुकाले!
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

दिनभर का जिनगी के कहते कहनियाँ,
जात कहीं फुनुगी पर छोड़त निशनियाँ,
काहे दो सकुचाले काहे लजाले!
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

चिरई-चुरुंगवा जे लेला बसेरा,
डाले चराऊर खोंता में डेरा,
सँझलवके नदिया किनारे नहाले!
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

Friday, October 17, 2014

देखत मौत के अब लजाइल का बानी - नागेन्द्र प्रसाद सिंह

देखत मौत के अब लजाइल का बानी
जो जाहीं के बा, त तवाइल का बानी

करे के रहे जे, ऊ सब हो गइल बा
किनाने चहुँप के छछाइल का बानी

बहुत दूर उड़लीं अकासे-पताले
करीं थिर मन के हहाइल का बानी

बहुत दिन पटवलीं लगावल बगइचा
तजीं मोह-माया, सुखाइल का बानी

जे बा मोटरी माथ पर ओके फेंकीं
करीं मन हलुक अब दबाइल का बानी

हँकारत बा मउअत खड़ा हो दुआरे
दुबुक घर का भीतर लुकाइल का बानी

Saturday, September 27, 2014

बात पर बात होता - मनोज कुमार सिंह 'भावुक'

बात पर बात होता बात ओराते नइखे
कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

कान में खोंट भरल बा तबे तs केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

बर्फ हऽ, भाप हऽ, पानी हऽ कि कुछुओ ना हऽ
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे

Thursday, September 25, 2014

कबले देह बिकाई? - रामनारायण उपाध्याय

एक देह पर सौ-सौ बोझा, कइसे आज खिंचाई
चाउर, दाल, नमक हरदी में-कबले देह बिकाई?
गलती पर गलती करि-करि के, लइका कइनी सात,
भइल बिलाला खइला बेगर, भेंटत नइखे भात,
तन उघार बा, कपड़ा नइखे, मिलतो कहाँ दवाई?
कइली खून-पसीना दिन भर, मिलल मजूरी आधा,
ऊहा सेठवा छीन ले गइल, पेट प दिहलस बाधा,
हाड़ हिलल पर भार ना उतरल, गतर-गतर चिथराई।
केहु के कुतवा दूध पिअत बा, केहु के पुतवा भूखल,
केहु के तोंद हाथ भर बाहर, केहु के पेटवा सूखल,
अरजी सुननिहार कहवाँ बा, आपन भइल पराई
एक त धरकच डहलस, दोसर बिटिया भइल सेयान,
कइसे हाथ पीअर होई, बेटहा भइले बैमान,
दिन में चैन ना रात में निंदिया, फाटल पाँव बेवाई

Monday, September 22, 2014

जागऽ जवान आज - दयाशंकर तिवारी

देशवा पर आइल बा संकट महान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो!
एही धरतिया के राम, कृष्ण, बापू,
शेखर, सुभाष, भगत भइले लड़ाकू।
ओकरे ही अंगना में विलखत विहान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो।।
विष बोवें जगह-जगह लम्पट अग्यानी,
तुलसी के भजन मौन, नानक के बानी।
बेअसर शब्द कीर्तन भजन औ अजान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो।।
घर-घर में आइल बा कइसन मजबूरी,
भाई अब भाई के भोंकि रहल छूरी।
रोग लगल कइसन, ना सूझे निदान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो।।
धरम सब समान, कहीं भेद ना बुझाला,
गिरजाघर, मंदिर भा मस्जिद, गुरुद्वारा।
राह भले अलग, एक मंजिल पहचान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो।।
देश में विदेशियन के जाल अधिकइलें,
फिर से जयचन्द, मीरजाफर बिकइलें।
सजग रहऽ सिद्ध संत, पंडित, पठान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो।।
दुनिया में प्रेम के सनेस जे पठावल,
ओकरे घर कइसन ई घृणा के महावल।
पलटऽ गुरुग्रन्थ, वेद, बाइबिल, कुरान हो,
जागऽ जवान आज जागऽ किसान हो।।

Friday, September 19, 2014

सपना- गोरख पाण्डेय

सूतल रहनी सपना एगो देखलीं
सपना मनभावन हो सखिया,
फूटल किरनिया पुरुब असमनवा
अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं
उजर घर आँगन हो सखिया,
त खेत भइलें आपन हो सखिया,
भगवलीं महाजन हो सखिया
केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिय,
ढहल इनरासन हो सखिया,
मिलल मोर साजन हो सखिया