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Tuesday, January 6, 2015

पिया मोर बसै गउरगढ़ मैं बसौं प्राग हों - धरनीदास

पिया मोर बसै गउरगढ़ मैं बसौं प्राग हों
सहजहिं लागू सनेह, उपजु अनुराग हो।
असन बसन तन भूषन भवन न भावै हो।
पल-पल समुझि सुरति मन, गहवरि आवै हों

पथिक न मिलहि सजन जन, जिनहिं जनावों हो।
विहवल विकल विलखि चित, चहुँदिसि धावों हों
होई अस मोहिं लेजाय कि, ताहि ले आवै हो।
तेकरि होइबों लउँडिया, जे रहिया बतावै हो।

तबहिं त्रिया पत जाय, दोसर जब चाहै हो।
एक पुरूष समरथ धन, बहुत न चाहै हो।
धरनी गति नहिं आनि, करहु जस जानहु हो।
मिलहु प्रगट पट खोलि, भरम जनि मानहु हो।

Wednesday, December 24, 2014

भोजपुरी गीतों में अश्लीलता

आज तक हमहन के समाज न ही पुराना खयालात पूरा तरह से छोड़ पवलेबा ना ही नया रीति-रिवाज के पूरा तरह से अपना पवले बा | अजीब से चितकाबर बानर बन गईल बा | अगर आप इ मानत हईं कि गीत- संगीत और सिनेमा समाज के दर्पण होला त इहो मनले में कउनो हरज नहीं होखे के चाही कि भोजपुरी गीतन में अश्लीलता या नंगापन ग्रामीण समाज में फैलल कुंठित भावना के अभिव्यक्ति मात्र ही ह | एगो नजरिया त इहो बा की ग्रामीण समाज दबा के रखे वाला चीजन के लेके सहज महसूस करेला अउर शायद एही से उनके एह अश्लीलता के लेके कउनो ख़ास शिकायत नइखे जवने तारे सभ्य समाज के बा |

बहुत पहिले मनोज तिवारी के एगो अलबम आईल रहे "पूरब के बेटा" ए अलबम के सगरी गाना अइसन बा की आप अपने पूरा परिवार के साथ बैठ के सुन सकेली | ओकरे कुछ समय बाद ही आईल मनोज तिवारी के ही भोजपुरी फिल्म "ससुरा बड़ा पईसा वाला" | यकीन मानी देवरिया के सूरज टाकिज में इ लगातार तीन महिना चलल | एह फिल्म के देखे खातिर ओह समय पूरा गाँव के गाँव आवे | लेकिन एकरे हिट होखले के बाद अचानक से भोजपुरी गानन के भरमार आवे लागल काहे से की मनोज तिवारी पहिले गाना गावत रहने फिर उनकर फिल्म आ गईल | त जल्दी मशहूर होखे के खातिर भोजपुरी गायक दू मतलब (द्विअर्थी) वाला गाना गावल शुरू कइले | फिर ट्रक, टेम्पो और बस वाला सब एह सब गाना के पूरा आवाज में चलावे लगने | और धीरे-धीरे कब इ सब गाना ट्रक, टेम्पो और बस वाला सब से आम इंसान के पास पहुच गईल इ न कहल जा सकेला | आज कम समय में ढेर मशहूर होखे के बा त एगो अलबम अइसन बना दी बस |

आज के भोजपुरी गीत में कल्पनाशीलता के अइसन-अइसन बाण छोड़ल जाला कि महाभारत के अर्जुन और कर्ण भी शर्म से डूब मरे | आज के भोजपुरी गीतन के चोली और लहंगा से त इतना गहरा रिश्ता बन गईल बा कि पूछी मत | जब तक कि गाना में एह दुन्नो के जिकर ना होई तबले गाना नाही पुरा हो सकेला | "मोरे लहंगा में आवे रे भूकम्प ", "लहंगा में सबसे बड़ा ATM", "हमरे लहंगा में मीटर लगा दी राजाजी", "तोहार लहंगा उठा देब रिमोट से" सब से शुरू भईल इ श्रृंखला कब जा के रुकी कहल न जा सकेला | अगर आपके अब्बो लगत होखे की कल्पनाशीलता के कुछ कमी बा त "हाई पॉवर के चुम्बक बाटे इनका दुप्पटा के पीछे" आ "कसम से देह रसगुल्ले  बा" उ कमी पूरा कर दिहें सब | गावें में एक गाना हर इंसान के मोबाइल में मिल जाई "मिस कॉल मारत तारु किस देबू का हो" | विश्वास करीं गावें के इतना विकास भईल कि आजुवो नंगे भईस चरावत आदमी के पास भी एगो महंगा मोबाइल सेट जरुर मिल जाई जेम्मे की कुछ अइसन ही गीत बाजत होई | ओकरे बादो अगर आप नहीं सुन पावत बानी त चिंता न करीं कवनो छोटहन लईका के पकड़ी, उ जरुर सुना देई उहो लाइव | अगर आप कही हिन्दी आ चाहे कौनो और भाषा बोले वाला लोगन के साथे खड़ा बानी त भोजपुरी के नाम लेहला से ही आपके अइसन नजर से देखल जाई की जैसे केतना बडहन गुनाह कर देहले बानी आप | और एकर सबसे बडहन कारन इहे अश्लील गाना हवें सब | एह परिस्थिति के बदले के जरुरत बा |

लोकगीतन के अपने इहाँ बहुत ही समृद्ध परम्परा रहल बा अवधी, बृजभाषा, भोजपुरी, मगही के गीतन के धूम रहल बा जेम्मे की जीवन के हर मोड़ खातिर गाना बा बिरह से लेके मिलन तक के, बचपन से लेके बुढ़ापा तक के, इहाँ तक कि मौसम के हिसाब से भी, जइसे होली के लोकगीत फगुआ से लेके चैता और कजरी तक | अउर एह सब गीतन के पद्मश्री शारदा सिन्हा, भारत शर्मा, मनोज तिवारी और बालेश्वर यादव जइसन गायक नया आयाम दिहलें | अइसे में अश्लीलता के भोजपुरी गीतन पर छा जावल बहुत खलेला | आज के समय में कवनो दुकान पर शायद ही कजरी, चैता या फिर फगुआ के कैसेट या सीडी मिले पर द्विअर्थी गाना के जरुर मिल जाई | पद्मश्री शारदा सिन्हा जी अपने एगो इंटरव्यू में कहले रहनी कि "पैसा के लालच में हम कैसे आपन थाती गवां देई" | बस एक लाइन में उहाँ के द्विअर्थी गाना बनले के सबसे बडहन कारन बता देहलीं |

एगो समय रहे जब भोजपुरी गीत, सुने वाला से इतना गहरा रिश्ता बना लें कि सुने वाला ओम्मे डूब जा कारन बस इ रहे कि ओह समय के गाना सब आपन माती और संस्कृति के असली झलक देखावें | "नदिया के पार" के गाना "कवने दिशा में लेके चला रे बटोहिया" होखे चाहे "बालम परदेशिया" के "गोरकी पतरकी रे" होखे में न त आज के तारे थोपल गईल गंभीरता रहे न ही कवनो तरह के अश्लीलता रहे लेकिन फिर भी आज तक सुने वाला लोगन के ना बस याद ह बाकिर गुनगुनावे पे भी मजबूर करेला |

Monday, December 8, 2014

दउरत-दउरत जिनिगी भार हो गइल - विजेन्द्र अनिल

दउरत-दउरत जिनिगी भार हो गइल,
भोरहीं में देखिलऽ अन्हार हो गइल।

केकरा के मीत कहीं, केकरा के दुश्मन,
बदरी में सभे अनचिन्हार हो गइल।

पुरवा के झोंका में गदराइल महुआ,
अचके में पछुआ बयार हो गइल।

दरिया में कागज के नाव चलि रहल,
गड़ही के पानी मँझधार हो गइल।

रेत के महल इहास बन्हले बा,
तुमड़ी के भाग, ऊ सितार हो गइल।

कतना उठान भइल दुनिया के,
प्रेम आउर कविता जेवनार हो गइल।

Thursday, November 6, 2014

गाँव क बरखा - चंद्रशेखर मिश्र

बरखा

हमरे गाँव क बरखा लागै बड़ी सुहावन रे।।
सावन-भादौ दूनौ भैया राम-लखन की नाईं,
पतवन पर जेठरु फुलवन पर लहुरु कै परछाईं।
बनै बयार कदाँर कान्ह पर बाहर के खड़खड़िया,
बिजुरी सीता दुलही, बदरी गावै गावन रे।।

बड़ी लजाधुर बिरई अंगुरी छुवले सकुचि उठेली,
ओहू लकोअॅरी कोहड़ा क बतिया, देखतै मुरझेली।
बहल बयरिया उड़ै चुनरिया फलकै लागै गगरिया,
नियरे रहै पनिघरा, लगै रोज नहावन रे।।

मकई जब रेसमी केस में मोती लर लटकावै,
तब सुगना रसिया धीर से घुँघट आय हटावै।
फूट जरतुहा बड़ा तिरेसिहा लखैत बिहरै छतिया,
प्रेमी बड़ी मोरिनियाँ लागै मोर नचावन रे।।

Tuesday, October 28, 2014

किरिनियाँ कहाँ चलि जाले? - अनिरुद्ध तिवारी 'संयोग'

सारी सोनहुली सबेर झमका के,
सँवकेरे रूप के अँजोर छिटिका के,
जाये का बेर ढेर का अगुताले-
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

चलत-चलत बीच रहिया में हारल,
दुपहरिया तेज तिजहरिया के मारल,
धनि बँसवरिया का पाछे लुकाले!
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

दिनभर का जिनगी के कहते कहनियाँ,
जात कहीं फुनुगी पर छोड़त निशनियाँ,
काहे दो सकुचाले काहे लजाले!
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

चिरई-चुरुंगवा जे लेला बसेरा,
डाले चराऊर खोंता में डेरा,
सँझलवके नदिया किनारे नहाले!
किरिनियाँ कले-कले कहाँ चलि जाले?

Friday, October 17, 2014

देखत मौत के अब लजाइल का बानी - नागेन्द्र प्रसाद सिंह

देखत मौत के अब लजाइल का बानी
जो जाहीं के बा, त तवाइल का बानी

करे के रहे जे, ऊ सब हो गइल बा
किनाने चहुँप के छछाइल का बानी

बहुत दूर उड़लीं अकासे-पताले
करीं थिर मन के हहाइल का बानी

बहुत दिन पटवलीं लगावल बगइचा
तजीं मोह-माया, सुखाइल का बानी

जे बा मोटरी माथ पर ओके फेंकीं
करीं मन हलुक अब दबाइल का बानी

हँकारत बा मउअत खड़ा हो दुआरे
दुबुक घर का भीतर लुकाइल का बानी

Friday, September 19, 2014

सपना- गोरख पाण्डेय

सूतल रहनी सपना एगो देखलीं
सपना मनभावन हो सखिया,
फूटल किरनिया पुरुब असमनवा
अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं
उजर घर आँगन हो सखिया,
त खेत भइलें आपन हो सखिया,
भगवलीं महाजन हो सखिया
केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिय,
ढहल इनरासन हो सखिया,
मिलल मोर साजन हो सखिया