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Thursday, April 16, 2015

जय माँ तरकुलहीं देवी

तरकुलहाँ देवी

१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम से पहिले के बात ह, ओह समय एह इलाका से गुर्रा नदी होके गुजरत रहे, जंगल एतना भयंकर कि दिन में भी सूरज के प्रकाश ना दिखे, एह जंगल से होके गुजरे खातिर आम लोग-बाग़ त डेराईबे करे साथै-साथ अंग्रेज के सिपाही भी डेरा, एही जंगल में डुमरी रियासत के बाबु बंधू सिंह रहत रहें | नदी के किनारे तरकुल के ढेर सारा पेड़ रहे, ओही पेड़न के नीचे बाबु बंधू सिंह माटी के पिंडी बना के अपने इष्ट देवी के पूजा करत रहनें, एही से एह जगह के नाम तरकुलहाँ देवी के नाम से पूरा भारत में प्रसिद्ध हो गईल | अंग्रेजन के अत्याचार दिन पर दिन बढ़त जात रहे, जनता आपन घर-बार छोड़ के जंगल में पनाह लेवे लागल रहे | बाबु बंधू सिंह बचपन से ही अंग्रेजन के अत्याचार देखत चली आईल रहने, उनके दिल में अंग्रेजन के खिलाफ नफ़रत पैदा हो गईल रहे, एह लिए उ लड़ाई के हर विधि सीखत रहने की समय आयिले पर अंग्रेजन से आपन जनता पर होत अत्याचार के बदला ले सकें, धीरे-धीरे बाबु साहब गुरिल्ला लड़ाई में माहिर हो गईलें और जब बढ़हन हो गईलें त आपन रियासत छोड़ के गोरखपुर से २५ किलोमीटर दूर चौरी-चौरा के पास के जंगलन में चली आईने, एहंवे उ अपने इष्ट देवी के पूजा करे लगने और जइसे ही मौका पावें अंग्रेजन पर अकेले हमला कर दें, उनकर शिकार उ अंग्रेज होंखें जवन ओह जंगल में आवें चाहे ओसे होके गुजरें | बाबु साहब न बस ओ अंग्रेजन के मरबे करीं बल्कि उनकर सर काट के अपने इष्ट देवी के चरण में अर्पित कर देईं | अइसे करत बहुत समय हो गईल एह बीच अंग्रेज इ समझें कि उनके सिपाही जंगल में जा के बिला जात हवें आ जंगली जानवरन के शिकार हो जात हवें | धीरे-धीरे अंग्रेजन के एह बात के पता चल गईल कि कवनो जानवर ना बल्कि इन्सान उनकर सिपाही सब के मारत हवें, अंग्रेज जंगल के कोना-कोना छान मरलें लेकिन बाबु साहब के ना पयिलें |अंग्रेज एक तरफ जायीं त बाबु साहब दुसरे ओर चलीं जायीं, आखिर एगो व्यापारी के मुखबिरी के चलते एक दिन बाबु बंधू सिंह जी धरा गईलें |

बाबू बंधू सिंह स्मारक

अंग्रेज उहाँ के पकड़ के अदालत में ले गयिने जहवां उहाँ के फंसी के सजा सुनावल गईल, १२ अगस्त १८५७ के उहाँ के गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सबके सामने फांसीं पर लटकावे के परयास कईल गईल | जइसे ही जल्लाद खटका खींचे उ खिंचाईबे न करे, पर जब उहाँ के हटा के बालू के बोरा लटका के दोबारा कोशिश कईल जा त खटका खिंचा जा और बोरा रसरी से लटक जा, लेकिन बाबु साहब के जब खड़ा कर के खींचल जा त खिचाईबे न करे | ६ बार उहाँ के हटा के बालू के बोरा लटका के कोशिश कईल गईल लेकिन हर बार उहे हाल | अंग्रेज परेशान पूरा जनता सामने खड़ा होके हंसत रहे और बाबु बंधू सिंह जी फंसी के तख्ता पर खड़ा होके मने-मन मुसकुरात रहनी, जब सातवीं बार उहाँ के फंसी के रसरी से बांधल गईल त उहाँ के खुद अपने इष्ट माता तरकुलहाँ देवी से विनती कईलीं की " हे माँ अब हमार मन एह दुनिया से उब गईल बा, एह लिए अब हमके अपने पास बोला लीं " | अउर एह बार में खटका खुल गईल और बाबु साहब फंसी पर झूल गईलीं | कहल जाला कि जवने समय बाबु साहब फंसी पर लटकनि ओही समय देवी माँ के पिंडी के पास खड़ा तरकुलन में से एगो तरकुल के उपरी भाग टूट गईल अउर ओम्मे से खून बहे लागल, एह खून से पास में बहत नदी के पूरा पानी लाल हो गईल |

माता का मन्दिर


आजादी के बाद आज भी तरकुलहाँ देवी के मान्यता अउर बढ़ गईल, अब उहाँ बाबु बंधू सिंह के याद में एगो स्मारक बना दिहल गईल बा लेकिन उपेक्षा के कारन ओहू के हालत ख़राब बा | तरकुलहाँ देवी के आशीर्वाद आज भी एह क्षेत्र में बसल लोगन के साथ बा | तरकुलहाँ देवी  या आकाशकामिनी माता आज भी गछवाहा समुदाय के इष्ट देवी हई जवन की आज भी तरकुल से ताड़ी उतारे के काम करे ला | तरकुलहाँ देवी मंदिर के दुसर विशेषता इहाँ मिले वाला मीट के परसादी हवे | बलि चढ़वले के जवन परंपरा बाबू बंधू सिंह शुरू कईले रहनी उ परंपरा आज भी इहाँ जियत बा | आज बलि इन्सान के ना बल्कि बकरा के चढ़ेला, बकरा के बलि चढ़ा के माटी के बर्तन में पका के साथ में लिट्टी के साथे परसादी के रूप में दिहल जाला | इहाँ के एगो और विशेषता हवे कहल जाला की मीट वाला परसादी के घरे ना ले जाए के चाही अगर बच जात बा त ओही जा गरीबन के खिया देवे के चाहीं अगर घरे लावे के कोशिश करल जाई त उ घरे तक ना पहुच पायी  अगर आप अपने घर से कुछ नईखी ले गईल तब्बो घबराईं ना इहाँ आपके माटी के बर्तन, गोइंठा, तेल से लेके गरम मसाला तक हर चीज मिल जाई | इहाँ के बलि प्रथा के बंद करावे के खातिर कोर्ट में केस चलत बा | साल में एक बार इहाँ चइत रामनवमी से लेके सावन के नाग पंचमी तक मेला लागेला, अउर हाँ मन्नत पूरा होखले पर घंटी बंधले के रिवाज ह जवने वजह से पूरा मंदिर में जगह जगह पर घंटी बंधल मिल जाई | इहाँ सोमवार और शुक्रवार के बहुत भीड़ होला |

जय माँ तरकुलहीं देवी

Saturday, December 20, 2014

अइसन भी होला - एगो अनोखा मान्यता

अपने देश भारत में आज भी कुछ अइसन परम्परा जीवित बाटे जवन की आज के सभ्य कहल जाया वाला समाज के आश्चर्यचकित करेला | अइसन ही एगो परम्परा के बारे में हम आज आप के बतावे जात बानी | ए परम्परा के शुरुवात कईसे भइल इ त आज केहू के ना मालूम बा लेकिन एसे जुडल समुदाय के लोगन के कहल बा की उ एकरे बारे में अपने पूर्वजन से सुनत आवत हवें | हिन्दू धर्म में कउनो सुहागिन आपन सुहाग के निशानी ना छोड सकेले और अगर अइसन होत बा त ओके बहुत ही बडहन अपशगुन मानल जाला | लेकिन ए परम्परा में पति के सलामती के खातिर पत्नी विधवा के जीवन जीयेली | इ परम्परा गछवाहा समुदाय से जुडल बा और इ समुदाय मुख्यतः ताड़ी के पेशा से जुडल ह | इ समुदाय पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया और एसे सटल बिहार के कुछ इलाका में रहेला |


तरकुलहा देवी (आकाशकामिनी माता )

ताड के पेड़ ५०-६० फिट से भी ऊँचा और एकदम चिकना होला और इ समुदाय के लोग इतना ऊंचाई से ताड़ी निकलले के काम करेने | ताड के पेड़ पर चढ़ के ताड़ी निकलले के काम बहुत ही खतरनाक होला | ताड़ी निकलले के काम चइत ( चैत ) महिना से लेके सावन महिना तक होखेला (कुल चार महीना ) | गछवाहा औरत जिनके की तरकुलारिष्ट भी कहल जाला ए चार महिना में ना त आपन मांग में सिंदूर भरेली और ना ही कउनो अउर श्रृंगार करेली | उ अपने सुहाग के निशानी तरकुलहा देवी  (गछवाहा समुदाय इहाँ के आकाशकामिनी माता के नाम से भी जानेला ) के पास रेहन रख के अपने पति के सलामती खातिर प्रार्थना करेली |

तरकुलहा देवी मंदिर

तरकुलहा देवी गछवाहा समुदाय के इष्ट देवी हइ | तरकुलहा देवी के मंदिर गोरखपुर से २० किलोमीटर के दुरी पर गोरखपुर-देवरिया मार्ग पर बा | पूर्वी उत्तर प्रदेश में इ हिन्दुअन के एगो प्रमुख धार्मिक स्थल हवे | गछवाहा औरत चइत के राम नवमी से लेके सावन के नाग पंचमी तक अइसे ही रहेली | ताड़ी के काम ख़तम होखले के बाद सब गछवाहा नाग पंचमी के दिने तरकुलहा देवी के मंदिर में जुट के पूजा करेने | पूजा के बाद गछवाहा महिलाये आपन-आपन मांग सिंदूर से भरेली और बाकी के भी श्रृंगार करेली |